यह कहानी एक दलित लड़के और एक ब्राह्मण लड़की की है, जो कॉलेज में मिलते हैं और प्यार में पड़ जाते हैं। शुरुआत में सब कुछ मासूम और आम लगता है, लेकिन जैसे ही रिश्ते की गहराई बढ़ती है, समाज का असली चेहरा सामने आने लगता है। लड़की का परिवार इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करता और लड़के की ज़िंदगी को नरक बना देता है।
इस फिल्म की खासियत यह है कि यह सीधे मुद्दे पर आती है। इसमें न तो भावनाओं को जबरदस्ती खींचा गया है और न ही कहानी को अनावश्यक मोड़ों में उलझाया गया है। इसकी ताकत इसके दमदार किरदारों और उनके इमोशनल गहराई से भरे अभिनय में है।
मुख्य भूमिका में नजर आए एक्टर ने अपने करियर का बेहतरीन परफॉर्मेंस दिया है। एक डरे-सहमे, दबे-कुचले लड़के का किरदार उन्होंने इतनी सच्चाई से निभाया है कि कुछ सीन देख कर रूह कांप उठती है। जब वो गुस्से में आते हैं या जब वो पिटते हैं, तो दर्शक उनके साथ खुद को जोड़ लेते हैं। यह अभिनय बताता है कि उन्होंने अपने किरदार को केवल निभाया नहीं, जिया है।

फिल्म की हीरोइन एक नॉन-ग्लैमरस, बेहद सधे हुए किरदार में दिखाई देती हैं। उन्होंने यह साबित किया है कि एक कलाकार सिर्फ चमक-धमक से नहीं, बल्कि परफॉर्मेंस से दिल जीत सकता है। इस फिल्म में उनकी अदायगी ‘कला’ जैसी फिल्मों की याद दिला देती है – गहराई, संवेदना और आत्मा से जुड़ी हुई।
फिल्म का विलेन एक ऐसा किरदार है जिसे देख कर आप नफरत से भर जाते हैं। वो समाज की गंदगी साफ करने का नाम लेकर हत्याएं करता है और खुद को न्यायप्रिय समझता है। उनकी एक्टिंग इतनी प्रभावशाली है कि स्क्रीन पर उनका हर सीन फिल्म को ऊंचाई देता है।
कॉलेज डीन के रूप में एक और पात्र आते हैं जो खुद दलित हैं और कहते हैं कि उन्होंने भी इस भेदभाव को झेला है। यह संवाद आपको सोचने पर मजबूर करता है कि एक जाति के व्यक्ति को सफलता पाने के लिए कितनी लड़ाइयाँ लड़नी पड़ती हैं।
फिल्म की लेखन टीम ने कहानी को गहराई दी है। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि फिल्म सिर्फ मनोरंजन के लिए बनाई गई है। फिल्म का हर डायलॉग, हर सीन एक मकसद के साथ सामने आता है – समाज को उसका आईना दिखाना।
फिल्म का संगीत खास तौर पर उल्लेखनीय है। टाइटल ट्रैक “बस एक धड़क” सीन के साथ भावनाओं को और भी गहराई देता है। भले ही यह पूरा नहीं सुनाया गया हो, लेकिन जितना भी आता है, फिल्म को और बेहतर बनाता है। बाकी गाने भी सोलफुल हैं और फिल्म की थीम को मजबूती देते हैं।

फिल्म इस बात को पूरी तरह साबित करती है कि रीमेक भी दमदार हो सकते हैं अगर उनका मकसद सिर्फ कहानी दोहराना नहीं बल्कि समाज को झकझोरना हो। इस फिल्म ने सिर्फ एक लव स्टोरी नहीं दिखाई बल्कि एक सामाजिक समस्या की ओर हमारी आंखें खोल दी हैं। इस तरह की फिल्मों की आज सिनेमा और समाज दोनों को सख्त ज़रूरत है।
करण जौहर जैसे फिल्ममेकर की यह कोशिश दर्शाती है कि अब हिंदी सिनेमा भी गंभीर सामाजिक मुद्दों को अपने कथानक का हिस्सा बना रहा है। फिल्म का निर्देशन सधा हुआ है, स्क्रीनप्ले प्रभावशाली है और परफॉर्मेंस दमदार हैं। यह फिल्म आपको सोचने पर मजबूर करती है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
5 में से 3 स्टार्स के साथ ये फिल्म ज़रूर देखिए और खुद तय कीजिए कि क्या वाकई ये सिर्फ लव स्टोरी है या उससे कहीं ज़्यादा।