सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश और बढ़ता विवाद
दिल्ली और देश के कई हिस्सों में लंबे समय से आवारा कुत्तों का मुद्दा एक बड़े विवाद की तरह उभरता रहा है। सड़कों पर बढ़ती कुत्तों की आबादी, लोगों पर हमले और बच्चों की सुरक्षा को लेकर समाज के अलग-अलग वर्ग लगातार आवाज़ उठाते रहे हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरे देश को दो हिस्सों में बांट दिया। अदालत ने कहा कि आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाया नहीं जाएगा बल्कि उनकी नसबंदी और टीकाकरण करके उन्हें वापस उसी जगह छोड़ दिया जाएगा।
जॉन अब्राहम का बयान और सोशल मीडिया पर हलचल
बॉलीवुड अभिनेता जॉन अब्राहम ने इस फैसले का खुले तौर पर स्वागत किया। उन्होंने पेटा इंडिया के माध्यम से एक बयान जारी किया जिसमें उन्होंने कहा कि कुत्तों की ओर से, मैं सर्वोच्च न्यायालय का आभारी हूं। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व होना चाहिए और कुत्तों को सड़कों से हटाना समाधान नहीं है। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया। एक ओर जॉन के समर्थक उनकी तारीफ करने लगे, तो दूसरी ओर आम नागरिकों ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया। आलोचकों का कहना है कि सितारे आलीशान घरों में रहते हैं और उन्हें सड़क की हकीकत का कोई अंदाज़ा नहीं है।
दो हिस्सों में बंटा समाज
समर्थक गुट मानता है कि नसबंदी और टीकाकरण से धीरे-धीरे समस्या खत्म हो सकती है। उनका कहना है कि कुत्तों को भी इंसान की तरह जीने का अधिकार है और उन्हें जबरन हटाना क्रूरता होगी।
विरोधी गुट का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट और जॉन अब्राहम जैसे सेलिब्रिटी आम जनता की सुरक्षा को नजरअंदाज कर रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि केवल दिल्ली में हर साल लाखों लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं।
आंकड़े जो चौंकाते हैं
2022 से 2024 के बीच केवल दिल्ली में 1.5 लाख से ज्यादा डॉग बाइट केस दर्ज हुए।
लखनऊ, पटना, गाजियाबाद और नोएडा जैसे शहरों में छोटे बच्चों की मौत तक हो चुकी है।
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट बताती है कि रेबीज़ के खतरे में सबसे ज्यादा गरीब तबका आता है क्योंकि उनके पास इलाज का खर्च उठाने की क्षमता नहीं होती।
कानून और संवैधानिक पहलू
भारत का पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 जानवरों को नुकसान पहुंचाने या उन्हें अमानवीय तरीके से हटाने पर रोक लगाता है। अदालत ने इसी कानून का हवाला देते हुए कहा कि सड़कों से कुत्तों को हटाना गैरकानूनी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई देश जैसे ब्राज़ील, श्रीलंका और थाईलैंड बड़े पैमाने पर स्टेरिलाइजेशन और वैक्सीनेशन प्रोग्राम चलाते हैं ताकि कुत्तों की संख्या नियंत्रित रहे लेकिन उनका प्राकृतिक परिवेश न छीना जाए।
नगरपालिकाओं की चुनौती
फैसला तो आ गया लेकिन असली चुनौती अब नगरपालिकाओं के सामने है। नसबंदी के लिए पशु चिकित्सक, दवाएं और बड़ी फंडिंग चाहिए। हर गली में फीडिंग स्टेशन बनाना आसान नहीं है। अक्सर ऐसे कार्यक्रम केवल कागजों पर ही रह जाते हैं। अगर निगरानी और पारदर्शिता नहीं हुई तो सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
सोशल मीडिया पर युद्ध
ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर #JohnAbraham और #StreetDogs ट्रेंड करने लगे। कुछ यूज़र्स ने लिखा कि जॉन सही कह रहे हैं, कुत्ते इंसान के दोस्त हैं। विरोधियों ने पलटवार किया कि जॉन अब्राहम अपने बंगले के बाहर फीडिंग स्टेशन बना लें तो पता चले। बहस इतनी बढ़ी कि कई जगहों पर राजनीतिक दल भी इसमें कूद पड़े और मुद्दा चुनावी रंग लेने लगा।
शहर बनाम प्रकृति की जंग
भारत का तेज़ी से होता शहरीकरण इस विवाद को और गहरा कर रहा है। इंसानों के लिए जगह बनती जा रही है लेकिन जानवर अपने प्राकृतिक आवास खो रहे हैं। नतीजतन वे मजबूरी में सड़कों पर आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल कुत्तों तक सीमित नहीं बल्कि यह इंसान और प्रकृति के रिश्ते का आईना भी है।