चेतेश्वर पुजारा, भारतीय टेस्ट क्रिकेट का वो नाम जिसे हमेशा एक ‘दीवार’ के रूप में जाना गया, अचानक से सभी फॉर्मेट से सन्यास लेकर सुर्खियों में आ गए हैं. हैरानी की बात ये है कि पुजारा ने केवल 4 साल ही इंटरनेशनल क्रिकेट खेला और उसके बाद ही उन्होंने मैदान को अलविदा कह दिया. यह फैसला न सिर्फ उनके फैंस के लिए बल्कि भारतीय क्रिकेट के लिए भी बड़ा झटका माना जा रहा है. क्रिकेट इतिहास में ऐसे कई खिलाड़ी रहे जिन्होंने अचानक खेल को छोड़कर सबको चौंका दिया लेकिन पुजारा का मामला इसलिए ज्यादा चर्चा में है क्योंकि उन्हें हमेशा टेस्ट टीम का सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज माना जाता था.
पुजारा का करियर बहुत छोटा रहा लेकिन उनकी बल्लेबाजी शैली हमेशा क्लासिक कही जाती रही. उन्होंने भारतीय टीम को कई अहम मौकों पर संभाला और कड़े हालातों में विपक्षी टीम के गेंदबाजों का डटकर सामना किया. उनकी तुलना हमेशा राहुल द्रविड़ से की जाती थी और लोग उन्हें टेस्ट क्रिकेट का भविष्य मानते थे. लेकिन जब करियर केवल 4 साल का ही रहा और अचानक से उन्होंने रिटायरमेंट का ऐलान कर दिया तो सवाल उठने लगे कि आखिर ऐसा क्यों हुआ. क्या चयनकर्ताओं ने उनका साथ छोड़ दिया, क्या टीम मैनेजमेंट को उनकी जरूरत नहीं रही या फिर पुजारा खुद मानसिक और शारीरिक रूप से थक चुके थे.
पुजारा ने जब शुरुआत की थी तो हर किसी ने कहा था कि भारतीय टीम को एक ऐसा बल्लेबाज मिल गया है जो लंबे वक्त तक क्रीज पर टिककर टीम को मजबूती देगा. उनकी सबसे बड़ी ताकत थी गेंद को समझना और फिर धैर्य के साथ रन बनाना. 2017 से 2021 तक का समय उनके करियर का सबसे अहम दौर रहा. इस दौरान उन्होंने कई यादगार पारियां खेलीं और टीम को संकट से बाहर निकाला. ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और साउथ अफ्रीका जैसी जगहों पर जाकर उन्होंने गेंदबाजों की नाक में दम किया. लेकिन जैसे-जैसे भारतीय टीम का फोकस तेज क्रिकेट, आक्रामक बल्लेबाजी और टी20 मानसिकता की ओर बढ़ा, वैसे-वैसे पुजारा जैसे खिलाड़ी टीम की सोच से बाहर होते चले गए.
क्रिकेट पंडितों का मानना है कि पुजारा की तकनीक बेहतरीन थी लेकिन टीम इंडिया में अब ऐसी बल्लेबाजी शैली के लिए जगह कम होती जा रही थी. कप्तान और कोच दोनों चाहते थे कि बल्लेबाज तेजी से रन बनाएं और विपक्ष पर दबाव डालें. ऐसे में पुजारा का डिफेंसिव खेल कई बार सवालों के घेरे में आ गया. खासकर विदेशी दौरों पर उनकी धीमी बल्लेबाजी को लेकर आलोचना होती रही. इसके बावजूद उन्होंने हमेशा अपनी रणनीति पर भरोसा किया और कहा कि टीम को किसी ऐसे खिलाड़ी की जरूरत है जो लंबे वक्त तक टिक सके.
पुजारा ने रिटायरमेंट का ऐलान करते वक्त ज्यादा खुलासा नहीं किया लेकिन उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि वे पिछले काफी समय से चयनकर्ताओं के रवैये से निराश थे. उन्हें बार-बार टीम से अंदर-बाहर किया गया, मौका मिलने के बाद भी अगले मैचों में बाहर बैठा दिया गया. ऐसे हालात में कोई भी खिलाड़ी मानसिक रूप से टूट सकता है. पुजारा का करियर इसी दबाव की वजह से छोटा रह गया.
सोशल मीडिया पर फैंस ने पुजारा के फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी. कई लोग कह रहे हैं कि भारतीय क्रिकेट ने अपना एक सच्चा योद्धा खो दिया जबकि कुछ का मानना है कि समय के साथ बदलाव जरूरी है और पुजारा का खेल अब टीम की सोच के अनुरूप नहीं था. ट्विटर और इंस्टाग्राम पर #ThankYouPujara और #WallOfIndia जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे.
पुजारा के सन्यास को लेकर विवाद भी खड़ा हो गया है. कई विशेषज्ञों का कहना है कि बोर्ड ने पुजारा जैसे बल्लेबाज का सही इस्तेमाल नहीं किया. जिन हालातों में टेस्ट क्रिकेट को संभालने के लिए उन्हें मौका देना चाहिए था, वहां उन्हें बाहर कर दिया गया. वहीं कुछ का कहना है कि पुजारा ने भी अपने खेल में बदलाव नहीं किया और आधुनिक क्रिकेट की जरूरतों के हिसाब से खुद को ढालने की कोशिश नहीं की.
गुजरात के राजकोट से आने वाले पुजारा ने घरेलू क्रिकेट में धूम मचाई थी. रणजी ट्रॉफी में उनकी पारियों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ 4 साल ही उनका करियर टिक पाया तो ये भी सवाल उठा कि आखिर क्यों भारतीय घरेलू क्रिकेट से आने वाले कई खिलाड़ी लंबे समय तक टीम में टिक नहीं पाते. कहीं न कहीं भारतीय क्रिकेट की चयन प्रक्रिया और खिलाड़ियों के साथ व्यवहार पर भी उंगली उठ रही है.
पुजारा के संन्यास के बाद टेस्ट क्रिकेट का भविष्य भी सवालों में है. जब द्रविड़, लक्ष्मण और पुजारा जैसे क्लासिक बल्लेबाज टीम में नहीं होंगे तो क्या भारत आगे भी वही मजबूत टेस्ट टीम बना रहेगा, जिसने विदेशी सरजमीं पर जाकर जीत हासिल की. क्या अब टीम इंडिया पूरी तरह तेज क्रिकेट खेलने वाले बल्लेबाजों पर ही निर्भर होगी. ये सवाल आने वाले समय में और भी अहम हो जाएंगे.
पुजारा का सफर छोटा जरूर रहा लेकिन उनकी छवि क्रिकेट इतिहास में हमेशा अमर रहेगी. उनकी धीमी लेकिन मजबूत बल्लेबाजी शैली, विपक्षी गेंदबाजों के सामने अडिग खड़े रहने की ताकत और टीम के लिए खुद को कुर्बान कर देने का जज्बा हमेशा याद किया जाएगा. उनके सन्यास ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या आधुनिक क्रिकेट में अब क्लासिकल बल्लेबाजों की कोई जगह बची भी है या नहीं.